2019 के लोकसभा चुनाव का इंतजार कर रहे लोगों की एक चिन्ता ‘हिन्दू राष्ट्र’ को लेकर है। यह एक ऐसी धारणा है जो भारत को वर्तमान संविधान जोकि धार्मिक नहीं है, से धार्मिक की ओर ले जाएगी। यह भारत को अधिक हिन्दू या पूरी तरह से हिन्दू देश बना देगी। कुछ लोगों का मानना है कि यदि भारतीय जनता पार्टी दोबारा पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में आती है तो उसे संविधान में कुछ ऐसे तत्व जोडऩे का साहस मिलेगा, जो देश को एक हिन्दू राष्ट्र बनाते हों। मुझे नहीं लगता कि यह संभव होगा। यह क्यों संभव नहीं होगा, मैं उसकी व्याख्या करता हूं।
मैं अपनी बात यहां से शुरू करना चाहूंगा कि व्यक्तिगत अधिकारों के दृष्टिकोण से इस बात से कोई खास फर्क नहीं पड़ता कि कौन-सी पार्टी देश में राज कर रही है। मैं जिस संगठन का हिस्सा रहा हूं, उसने जम्मू-कश्मीर में दशकों तक काम किया है और ताकत का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल तथा सेना के लिए दंड का अभाव कोई ऐसी चीज नहीं है जो हाल ही में घटित हुई हो और न ही वह इस सरकार की देन है। इसी प्रकार अफस्पा, वह कानून जो सेना को हमारी अदालतों में मुकद्दमेबाजी से बचाता है, वर्तमान भाजपा सरकार की देन नहीं है।
भारत के कमजोर तबके, चाहे वे दलित हों या आदिवासी, मुस्लिम हों या अन्य अल्पसंख्यक, के अधिकारों से संबंधित कोई भी मसला नया नहीं है। सिर्फ एक चीज जो इस सरकार की नीतियों के कारण जुड़ी है, वो है मांस आधारित लिंचिंग की महामारी। परन्तु इसके अलावा अन्य चीजों में कोई बदलाव नहीं है। दूसरे, किसी भी उस व्यक्ति की तरह जो पाकिस्तान गया हो और जिसने कई सालों तक उसे समझा हो, की तरह मैं भी यह कह सकता हूं कि किसी व्यक्ति के लिए ‘धार्मिक’ राज्य अथवा ‘धर्म-निरपेक्ष’ राज्य के जीवन में ज्यादा फर्क नहीं है। यह सही है कि पाकिस्तान में कुछ कानून जान-बूझ कर अल्पसंख्यकों के लिए भेदभावपूर्ण बनाए गए हैं।
उदाहरण के लिए वहां का संविधान किसी भी गैर-मुस्लिम को प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति बनने से रोकता है। इसके अलावा मुस्लिम समुदाय में अहमदिया समुदाय को स्वतंत्र रूप से अपने धार्मिक क्रिया-कलाप आयोजित करने की इजाजत नहीं है। परन्तु बाकी सभी चीजें भारत की तरह ही हैं। पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की संख्या कम है, परन्तु उनमें भी उसी तरह से असुरक्षा की भावना है, जैसे भारत के अल्पसंख्यकों में। आईए अब इस बात पर चर्चा करें कि हिन्दू राष्ट्र का क्या मतलब है। इसमें यहां दो तत्व हैं, ठीक उसी तरह जैसे किसी धार्मिक अथवा धर्मतंत्रीय देश में होते हैं। पहला यह कि धर्म के मूल्य तथा इसकी संस्कृति कानून में शामिल कर दी जाती है। उदाहरण के लिए, कुछ मुस्लिम देशों में शराब पर प्रतिबंध है तथा रमजान के महीने में लोगों को दिन में अपने रैस्टोरैंट बंद करने पर मजबूर किया जाता है। इस तरह की कुछ चीजें भारत में पहले से ही हैं। हमारे कानूनों में शराब और गौवध पर प्रतिबंध कुछ मायनों में और बहुत से राज्यों में पहले से ही मौजूद है।
दूसरा तत्व है लोगों को धर्म और ङ्क्षलग के आधार पर बांटना और उन्हें यह बताना कि वे क्या कर सकते हैं और क्या नहीं। यह धर्मतंत्रीय देश का गहरा पहलू है, जिसके प्रति लोगों में डर है। हिन्दू राष्ट्र की समस्या यह है कि इसके पास कोई ऐसा विषय नहीं है, जिसे आधुनिक दुनिया के हिसाब से ढाला जा सके। समाज और देश को हिन्दूवादी तरीके से ढालने का एक अहम तत्व है, उसे जाति आधारित बनाना। यह अधिकतर हिन्दुओं को स्वीकार नहीं है। उत्तर से लेकर दक्षिण भारत की राजनीति में जिन राजनीतिक समुदायों का वर्चस्व है उनमें शूद्र किसान प्रमुख हैं, जिनमें पाटीदार, वोकालिगा, जाट, यादव, रैड्डी तथा अन्य शामिल हैं। अधिकतर मंत्री और मुख्यमंत्री इन्हीं जातियों से हैं।
कानून में कोई परिवर्तन होने के कारण ये समुदाय ब्राह्मणों को स्वेच्छा से अपनी शक्ति नहीं देंगे। हिन्दू राष्ट्र इन्हें कोई ऐसी चीज नहीं देगा, जो उनके पास पहले न हो। इसी प्रकार दलित और आदिवासी, जो हमारी जनसंख्या का एक-चौथाई हिस्सा है, उन्हें भी हिन्दू राष्ट्र से कुछ नहीं मिलेगा, इसलिए वे भी इसे नहीं चाहेंगे। एक ऐसी प्रणाली जो हिन्दू धर्म को विशेषाधिकार प्रदान करती हो, उसे जाति पर आधारित होना होगा तथा यही इसके रास्ते में अड़चन है। 2008 तक नेपाल दुनिया में एकमात्र हिन्दू देश था। 2008 में यहां गणतंत्र की स्थापना के साथ ही छेत्री (क्षत्रिय) वंश का राज्य समाप्त हो गया। नेपाल हिन्दू राष्ट्र क्यों था? क्योंकि मनु स्मृति के अनुसार कार्यकारी शक्ति एक राजा के हाथ में रहती थी। परन्तु नेपाल उस सीमा तक ही ‘हिन्दू राष्ट्र’ था।
हिन्दू धार्मिक किताबों से कुछ ज्यादा लागू नहीं किया जा सका क्योंकि यह मानवाधिकारों की वैश्विक घोषणा के विपरीत था। इसलिए हिन्दू राष्ट्र बनाने के लिए संविधान में क्या परिवर्तन किए जा सकते हैं? हम गैर -हिन्दुओं के साथ भेदभाव कर सकते हैं तथा उन्हें उनके अधिकारों से वंचित कर सकते हैं। इसमें से कुछ हमने पहले ही किया हुआ है। गुजरात और बिहार में ईसाई उपसंस्कार संबंधी वाइन नहीं पी सकते तथा भारत के अधिकतर भागों में मुसलमान गाय की बलि नहीं दे सकते। अन्य अधिकार हमने आधिकारिक तौर पर नहीं छीने हैं। यहां मुसलमानों के प्रधानमंत्री बनने पर प्रतिबंध नहीं है परन्तु इस समय निकट भविष्य में इसकी कल्पना नहीं की जा सकती। राजनीति में 1947 के बाद मुसलमानों का प्रतिनिधित्व सबसे कम है तथा भारत में यह मुद्दा भी नहीं है।
हिन्दू राष्ट्र के तहत हम और आगे जाकर आधिकारिक तौर पर ईसाइयों और मुसलमानों से कुछ राजनीतिक अधिकार छीन सकते हैं। हालांकि, क्योंकि हिन्दू राष्ट्र बहुसंख्यक हिन्दुओं के अधिकारों पर भी प्रतिबंध लगाता है, इसलिए हम आश्वस्त हो सकते हैं कि भाजपा या अन्य कोई ताकत हिन्दू राष्ट्र नहीं बना सकती। इसलिए हिन्दू राष्ट्र की अवधारणा अनिश्चित है और हमेशा अनिश्चित ही रहेगी


